Vehicles to Run on Biogas | अहमदाबाद में गोबर गैस से दौड़ रही हैं गाड़ियां, पेट्रोल से ₹20 सस्ता ईंधन


अहमदाबाद: भारत में स्वच्छ और सस्ते ईंधन की दिशा में एक बड़ी पहल सामने आई है। अब तक केवल खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाला गोबर गैस (बायोगैस) अब वाहनों का ईंधन भी बन रहा है। गुजरात के बनासकांठा जिले में मारुति सुजुकी और बनास डेयरी ने मिलकर इस अनोखे प्रयोग को सफल बनाया है।

इस बायो-सीएनजी (Bio-CNG) पंप पर प्रतिदिन 600 से 700 वाहन ईंधन भर रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि यह ईंधन पारंपरिक ईंधनों की तुलना में किफायती है और इसकी कीमत ₹80 प्रति किलोग्राम है, जो पेट्रोल की तुलना में लगभग ₹20 सस्ता पड़ता है।



कैसे बनता है बायो-सीएनजी?

रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना के लिए आसपास के 16 गांवों से हर दिन करीब 88 टन गोबर एकत्र किया जाता है। किसानों को इसके बदले ₹1 प्रति किलोग्राम का भुगतान किया जाता है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत भी मिला है।

किसानों और पर्यावरण दोनों को फायदा

इस परियोजना में बनास डेयरी ने किसानों का नेटवर्क और गोबर उपलब्ध कराया, जबकि मारुति सुजुकी ने तकनीक और निवेश उपलब्ध कराया। बायोगैस बनाने के बाद बचा हुआ अवशेष दोबारा किसानों को जैविक खाद के रूप में दिया जाता है। इससे कचरे का बेहतर उपयोग होने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय—दोनों को लाभ मिल रहा है।

भारत के लिए क्यों है अहम?

भारत लंबे समय से पेट्रोल और डीजल के आयात पर निर्भर है। ऐसे में बायो-सीएनजी जैसे स्वदेशी और हरित ईंधन न केवल ईंधन आयात का बोझ कम कर सकते हैं, बल्कि प्रदूषण घटाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।




अहमदाबाद: भारत में स्वच्छ और सस्ते ईंधन की दिशा में एक बड़ी पहल सामने आई है। अब तक केवल खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाला गोबर गैस (बायोगैस) अब वाहनों का ईंधन भी बन रहा है। गुजरात के बनासकांठा जिले में मारुति सुजुकी और बनास डेयरी ने मिलकर इस अनोखे प्रयोग को सफल बनाया है।

इस बायो-सीएनजी (Bio-CNG) पंप पर प्रतिदिन 600 से 700 वाहन ईंधन भर रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि यह ईंधन पारंपरिक ईंधनों की तुलना में किफायती है और इसकी कीमत ₹80 प्रति किलोग्राम है, जो पेट्रोल की तुलना में लगभग ₹20 सस्ता पड़ता है।



कैसे बनता है बायो-सीएनजी?

रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना के लिए आसपास के 16 गांवों से हर दिन करीब 88 टन गोबर एकत्र किया जाता है। किसानों को इसके बदले ₹1 प्रति किलोग्राम का भुगतान किया जाता है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत भी मिला है।

किसानों और पर्यावरण दोनों को फायदा

इस परियोजना में बनास डेयरी ने किसानों का नेटवर्क और गोबर उपलब्ध कराया, जबकि मारुति सुजुकी ने तकनीक और निवेश उपलब्ध कराया। बायोगैस बनाने के बाद बचा हुआ अवशेष दोबारा किसानों को जैविक खाद के रूप में दिया जाता है। इससे कचरे का बेहतर उपयोग होने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय—दोनों को लाभ मिल रहा है।

भारत के लिए क्यों है अहम?

भारत लंबे समय से पेट्रोल और डीजल के आयात पर निर्भर है। ऐसे में बायो-सीएनजी जैसे स्वदेशी और हरित ईंधन न केवल ईंधन आयात का बोझ कम कर सकते हैं, बल्कि प्रदूषण घटाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।



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