एसडीएम ने नालों, जलभराव वाले क्षेत्रों एवं सीवरेज कार्यों का किया निरीक्षण

.... अनुविभागीय अधिकारी राजस्व श्रीमती अमृता गर्ग ने वर्षा ऋतु के मद्देनज़र नगर में जलभराव की समस्या से नागरिकों को राहत दिलाने एवं जल निकासी व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के उद्देश्य से नगर पालिका परिषद शहडोल क्षेत्र के विभिन्न नालों, संभावित जलभराव वाले क्षेत्रों तथा सीवरेज पाइपलाइन बिछाने के कार्यों का निरीक्षण किया। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि नाला सफाई कार्य प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र पूर्ण किया जाए, ताकि वर्षा के दौरान किसी भी क्षेत्र में जलभराव की स्थिति उत्पन्न न हो। उन्होंने संचालित सीवरेज पाइपलाइन बिछाने के कार्यों का भी निरीक्षण किया तथा कार्यों की प्रगति की समीक्षा करते हुए सभी निर्माण कार्य निर्धारित समय-सीमा में पूर्ण करने के निर्देश दिए। साथ ही सभी कार्यस्थलों पर बैरिकेडिंग, सुरक्षा घेराव एवं चेतावनी संकेतक (साइन बोर्ड) अनिवार्य रूप से लगाने के निर्देश दिए। निरीक्षण के दौरान मुख्य नगर पालिका अधिकारी श्री निशांत सिंह सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

भारतीय सेना के जाबाज़ सैनिक वीर अब्दुल हमीद का आज जन्मदिन है।60 साल पहले जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ था, तब वीर अब्दुल हमीद ने ऐसा पराक्रम करके दिखाया, जिसकी कहानी आज भी जब सुनाई जाती है तो विश्वास नहीं होता कि एक अकेले सैनिक ने इतना बड़ा काम किया होगा, जो अविश्वसनीय था।


हालांकि अपने इस पराक्रम में उन्हें मृत्यु का सामना करना पड़ा. बाद में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. अब्दुल हमीद की कहानी एक देशभक्त, साहस और बलिदान की गाथा है, जो आज भी सैनिकों को प्रेरित करती है।

अब्दुल हमीद भारतीय सेना के वीर सैनिक थे. 10 सितंबर 1965 में रणक्षेत्र में वह शहीद हुए थे. उन्होंने कैसे एक के बाद एक पाकिस्तान के 9 टैंकों को चकनाचूर कर दिया था।

अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था. उनके पिता मोहम्मद उस्मान दर्जी का काम करते थे. बचपन से ही हमीद में देशसेवा का गजब का जुनून था. पढ़ाई में रुचि कम थी लेकिन कुश्ती, लाठी चलाने और निशानेबाजी में खूब माहिर थे. 20 वर्ष की आयु में हमीद वाराणसी में भारतीय सेना की 4 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में भर्ती हुए।

8 सितंबर, 1965 को अब्दुल हमीद पंजाब के तरनतारन जिले के केमकपण सेक्टर में तैनात थे। युद्ध के 10 दिन पहले ही वो छुट्टी पर अपने घर गए थे। इसी बीच, पाक की ओर से तनाव बढ़ने लगा, जिसके बाद सभी जवानों को ड्यूटी पर वापस बुलाया गया। कहा जाता है कि वापसी की तैयारियों के दौरान उनके साथ कई अपशगुन हुए थे, जिसके कारण उनका परिवार उन्हें जाने से मना कर रहा था, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी।

पाकिस्तान ने उस समय के अमेरिकन पैटन टैंकों से खेमकरण सेक्टर के असल उताड़ गांव पर हमला कर दिया। उस समय ये अमेरिकन टैंक अपराजेय माने जाते थे। अब्दुल हमीद की जीप 8 सितंबर, 1965 को सुबह 9 बजे चीमा गांव के बाहरी इलाके में गन्ने के खेतों से गुजर रही थी। उसी दौरान उन्हें टैंकों के आने की आवाज सुनाई दी और कुछ ही देर में टैंक दिखने भी लग गया। इसके बाद हामिद ने गन्ने के खेत का फायदा उठाया और वहीं छिप गए।

उन्होंने दुश्मन के टैंकों पर सटीक निशाना साधा. एक के बाद एक आठ पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया. पाकिस्तानी सेना में खलबली मच गई. उनकी इस वीरता ने युद्ध का रुख बदल दिया. हालांकि नौवां टैंक नष्ट करते समय दुश्मन टैंक से निकला गोला उनकी जीप पर लगा. वह वीरगति को प्राप्त हुए।

अमेरिका तक गूंजी थी हमीद की बहादुरी
वीर अब्दुल हमीद की बहादुरी की गूंज अमेरिका तक पहुंच गई थी। अमेरिका हैरान था कि उनके अजेय कहे जाने वाली टैंक को एक साधारण दिखने वाली रिकॉयलेस गन से कैसे ध्वस्त किया जा सकता है।
अमेरिका ने अपने अजेय टैंक की दोबारा समीक्षा की थी। आज भी यह अमेरिका के लिए पहेली बनी हुई है कि आखिर एक साधारण गन से उनके टैंकों को किस तरह से नष्ट किया गया है।🇮🇳💐🇮🇳🇮🇳

#indianarmy
हालांकि अपने इस पराक्रम में उन्हें मृत्यु का सामना करना पड़ा. बाद में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. अब्दुल हमीद की कहानी एक देशभक्त, साहस और बलिदान की गाथा है, जो आज भी सैनिकों को प्रेरित करती है।

अब्दुल हमीद भारतीय सेना के वीर सैनिक थे. 10 सितंबर 1965 में रणक्षेत्र में वह शहीद हुए थे. उन्होंने कैसे एक के बाद एक पाकिस्तान के 9 टैंकों को चकनाचूर कर दिया था।

अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था. उनके पिता मोहम्मद उस्मान दर्जी का काम करते थे. बचपन से ही हमीद में देशसेवा का गजब का जुनून था. पढ़ाई में रुचि कम थी लेकिन कुश्ती, लाठी चलाने और निशानेबाजी में खूब माहिर थे. 20 वर्ष की आयु में हमीद वाराणसी में भारतीय सेना की 4 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में भर्ती हुए।

8 सितंबर, 1965 को अब्दुल हमीद पंजाब के तरनतारन जिले के केमकपण सेक्टर में तैनात थे। युद्ध के 10 दिन पहले ही वो छुट्टी पर अपने घर गए थे। इसी बीच, पाक की ओर से तनाव बढ़ने लगा, जिसके बाद सभी जवानों को ड्यूटी पर वापस बुलाया गया। कहा जाता है कि वापसी की तैयारियों के दौरान उनके साथ कई अपशगुन हुए थे, जिसके कारण उनका परिवार उन्हें जाने से मना कर रहा था, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी।

पाकिस्तान ने उस समय के अमेरिकन पैटन टैंकों से खेमकरण सेक्टर के असल उताड़ गांव पर हमला कर दिया। उस समय ये अमेरिकन टैंक अपराजेय माने जाते थे। अब्दुल हमीद की जीप 8 सितंबर, 1965 को सुबह 9 बजे चीमा गांव के बाहरी इलाके में गन्ने के खेतों से गुजर रही थी। उसी दौरान उन्हें टैंकों के आने की आवाज सुनाई दी और कुछ ही देर में टैंक दिखने भी लग गया। इसके बाद हामिद ने गन्ने के खेत का फायदा उठाया और वहीं छिप गए।

उन्होंने दुश्मन के टैंकों पर सटीक निशाना साधा. एक के बाद एक आठ पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया. पाकिस्तानी सेना में खलबली मच गई. उनकी इस वीरता ने युद्ध का रुख बदल दिया. हालांकि नौवां टैंक नष्ट करते समय दुश्मन टैंक से निकला गोला उनकी जीप पर लगा. वह वीरगति को प्राप्त हुए।

अमेरिका तक गूंजी थी हमीद की बहादुरी
वीर अब्दुल हमीद की बहादुरी की गूंज अमेरिका तक पहुंच गई थी। अमेरिका हैरान था कि उनके अजेय कहे जाने वाली टैंक को एक साधारण दिखने वाली रिकॉयलेस गन से कैसे ध्वस्त किया जा सकता है।
अमेरिका ने अपने अजेय टैंक की दोबारा समीक्षा की थी। आज भी यह अमेरिका के लिए पहेली बनी हुई है कि आखिर एक साधारण गन से उनके टैंकों को किस तरह से नष्ट किया गया है।🇮🇳💐🇮🇳🇮🇳

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