आजकल जिस उम्र में ज्यादातर युवा यह नहीं तय कर पाते कि उन्हें जीवन में क्या करना है, उस उम्र में शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा ने यह तय कर लिया था कि या तो वह घर तिरंगा फहरा कर जाएंगे या फिर उसमें लिपट कर


सिर्फ़ 25 साल की उम्र लेकिन विक्रम की सोच कहीं आगे की थी. चेहरे पर किसी तरह के डर और घबराहट का नामोनिशान नहीं था. प्वाइंट 4875....इस चोटी के दोनों तरफ़ खड़ी ढलान थी. दुश्मनों की नाकाबंदी ने और भी मुश्किलें बढ़ा दी थी।

प्वाइंट 4875 में जो घमासान हुआ, वो बेहद ख़तरनाक था. कैप्टन बत्रा ख़ुद आगे से लीड कर रहे थे.. आमने-सामने की लड़ाई में उन्होंने सात दुश्मन सैनिकों को मार गिराया...गोली और बमबारी में गंभीर ज़ख़्मी होने के बाद भी उन्होंने दुश्मन की ओर ग्रेनेड फेंके. ये मुश्किल जंग अंत में भारतीय सेना जीत गई...लेकिन कैप्टन विक्रम बत्रा वीरगति को प्राप्त हुए।

अपने बेटे की शहादत को याद करते हुए पिता गिरधारी लाल बत्रा का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है. बताते हैं कि विक्रम की कंपनी ने प्वायंट 4875 के लिए ख़ुद को वॉलंटियर किया. जब उनका एक जूनियर नवीन ज़ख़्मी होता है तो इन्होंने फ़ैसला लिया कि उसको लाना है।

सूबेदार जाने के लिए तैयार होते हैं, लेकिन वो उन्हें रोक देते हैं और खुद चले जाते हैं. उसको सुरक्षति मोर्चे पर पहुंचाते हैं, और खुद डट जाते हैं. वहां 5 लोगों को अकेले मारते हैं. एक पाकिस्तानी सैनिक इन्हें गोली मार देता है. वो शहीद हो जाते हैं. इसके बाद पूरी टीम पूरी ताकत से हमला कर देती है, और मिशन पूरा कर देती है।

राष्ट्र के महान् विभूति कैप्टेन विक्रम बत्रा को उनके पुण्यतिथि पर भावपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि।💐🇮🇳🇮🇳💐

#indianarmy

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