आदिवासी किसानों का 'चिता आंदोलन' खत्म, लेकिन न्याय की मांग अब भी कायम
मध्य प्रदेश के छतरपुर–पन्ना क्षेत्र में केन–बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित आदिवासी किसानों का प्रतीकात्मक 'चिता आंदोलन' रविवार तड़के पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई के बाद समाप्त हो गया। आंदोलनकारी कई दिनों से उचित मुआवजा, सम्मानजनक पुनर्वास और विस्थापन से जुड़े मुद्दों को लेकर जल सत्याग्रह, भूख हड़ताल और प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उनका संदेश स्पष्ट था—"न्याय दो या मौत दो।"
रिपोर्टों के अनुसार, भारी पुलिस बल की मौजूदगी में प्रदर्शनकारियों को धरनास्थल से हटाया गया। कुछ आंदोलनकारियों और महिलाओं ने आरोप लगाया कि उन्हें जबरन हटाया गया और मारपीट की गई। वहीं, छतरपुर के एडिशनल एसपी आदित्य पटले ने गिरफ्तारी या हिरासत के आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि पन्ना जिले के प्रदर्शनकारियों को बसों के माध्यम से उनके गंतव्य तक भेजा गया। इन दावों और आरोपों की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आंदोलन समाप्त होने से प्रभावित परिवारों की समस्याएं भी समाप्त हो गईं? जिन आदिवासी और किसान परिवारों की जमीन, घर और आजीविका इस परियोजना से प्रभावित हो रही है, उन्हें कानून के अनुरूप उचित मुआवजा, सुरक्षित पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन का अधिकार मिलना चाहिए।
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और अपने अधिकारों की मांग करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। प्रशासन की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ प्रभावित लोगों की बात सुनने, उनकी शिकायतों पर संवेदनशीलता से विचार करने और न्यायपूर्ण समाधान सुनिश्चित करने की भी है।
धरना समाप्त कराया जा सकता है, लेकिन न्याय की मांग समाप्त नहीं होती। विकास आवश्यक है, परंतु यह तभी सार्थक माना जाएगा जब वह प्रभावित लोगों के अधिकारों, सम्मान और भविष्य की सुरक्षा के साथ आगे बढ़े।
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