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ज़िंदगी में कई बार हम ऐसे मोड़ पर आकर खड़े हो जाते हैं, जहाँ दिल और दिमाग दोनों एक ही सवाल पूछते हैं—तो क्या होगा? जब हालात हमारे हाथ में नहीं रहते, जब सपने अधूरे लगने लगते हैं, तब यही सवाल बार-बार मन में उठता है। इस पोस्ट में हम आपके लिए लेकर आए हैं ऐसी शायरी, जो इस उलझन और एहसास को गहराई से बयां करती है।
कभी मोहब्बत में, कभी जिंदगी के फैसलों में, हम सोचते रह जाते हैं—तो क्या होगा अगर सब कुछ वैसा ना हुआ जैसा हमने चाहा। यह सवाल डर भी पैदा करता है और हमें सोचने पर मजबूर भी करता है। लेकिन यही एहसास हमें मजबूत बनाता है और सिखाता है कि हर अनिश्चितता के पीछे एक नई शुरुआत छुपी होती है।
जब दिल टूटा होता है या उम्मीदें कमजोर पड़ जाती हैं, तब तो क्या होगा सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि एक भावना बन जाता है। ऐसी शायरी आपको आपके ही जज़्बातों से जोड़ती है और यह एहसास दिलाती है कि आप अकेले नहीं हैं।
अगर आप भी अपने दिल की इस उलझन को शब्द देना चाहते हैं, तो यह शायरी आपके लिए एकदम सही है। क्योंकि कभी-कभी जवाब से ज्यादा जरूरी होता है उस सवाल को महसूस करना—तो क्या होगा… 💔✨
वक़्त बदल रहा है ज़माना बदल रहा है इंसान बदला तो क्या होगा ,
शामों में बैठ के सोचा रातों में रोया दिन में मुस्कुराया तो क्या होगा।
ये इंसानी क़ुव्वत है हर दर्द-ए-दिल का हल निकाल ही लेता है,
अगर किसी से जुदा हुआ फिर भी ना हुआ अलहदा तो क्या होगा ।
ये इक सफ़र भी मुकम्मल नहीं आधी सांसें आधी रूह है,
इसकी मंज़िल तो मौत है जुस्तजू-ए-ज़ीस्त ना मिला तो क्या होगा।
सर्कसी में मसरूफ़ और अनजान है अपने मक़सद से,
ख़ुदा की नेमतों पे ग़ौर नहीं कर रहा यूँ इतराता रहा तो क्या होगा।
फूलों को मसला और तितलियों के पर तक नोच डालें,
क़ुदरत से क्यों उलझ रहा है गर क़ुदरत ने जवाब दिया तो क्या होगा।
आबशार तो ना जाने कितनी आँखें हैं और मायूसी भी,
इश्क़ तो बेशकीमती है अगर किसी ने ख़रीदना चाहा तो क्या होगा।
शिकस्ता हाल और मुन्तज़िर-ए-मोजज़ा इरफ़ान,
जो तुमने तसव्वुर किया है वो ना आया तो क्या होगा।
𝓘𝓻𝓯𝓪𝓷 ¬ عرفان
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